सुख और दुःख का सबसे बड़ा रहस्य

सुख और दुःख का सबसे बड़ा रहस्य (Greatest secret of Happiness) जानिए। यह प्रेरणादायक वीडियो देखें केवल Param Vichar पर।
क्या आपकी खुशी किसी और के हाथों में है?क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी की एक बात ने आपका पूरा दिन खराब कर दिया हो?किसी ने आपकी तारीफ की तो आप खुश हो गए.किसी ने आलोचना कर दी तो आप दुखी हो गए. सोचिए, अगर आपकी खुशी और दुःख का नियंत्रण किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ में है, तो क्या आप वास्तव में स्वतंत्र हैं? हजारों वर्ष पहले हमारे ऋषियों ने एक ऐसा सूत्र दिया था, जो सुख और दुःख का पूरा रहस्य केवल एक श्लोक में समझा देता है।

सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥
अर्थात् — जो दूसरों के अधीन है वह दुःख है, और जो अपने नियंत्रण में है वही सुख है।
इस गहरे सत्य को at Param Vichar एक कहानी के माध्यम से समझते हैं।

Greatest secret of Happiness

बहुत समय पहले एक समृद्ध नगर में अर्जुन नाम का एक व्यापारी रहता था। उसके पास धन था, प्रतिष्ठा थी, बड़ा घर था और परिवार भी सुखी था। फिर भी वह हमेशा चिंतित रहता था। यदि बाजार में लाभ हो जाता तो वह अत्यंत प्रसन्न हो जाता। यदि थोड़ा सा नुकसान हो जाता तो रातभर सो नहीं पाता। यदि लोग उसकी प्रशंसा करते तो उसका आत्मविश्वास बढ़ जाता। लेकिन यदि कोई उसकी आलोचना कर देता तो उसका मन टूट जाता। धीरे-धीरे उसकी स्थिति ऐसी हो गई कि उसका सुख और दुःख पूरी तरह दूसरों और परिस्थितियों पर निर्भर हो गया। एक दिन उसे लगा कि इतना सब कुछ होते हुए भी उसके जीवन में शांति क्यों नहीं है। इसी चिंता में वह नगर के बाहर रहने वाले एक प्रसिद्ध संत के पास पहुँचा।

अर्जुन ने संत से पूछा—”गुरुदेव, मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मुझे सुख नहीं मिलता। मेरा मन हर समय बेचैन रहता है।” संत मुस्कुराए और बोले—”कल सूर्योदय से पहले नदी किनारे आना। मैं तुम्हें उत्तर दूँगा।” अगली सुबह अर्जुन समय पर पहुँच गया। संत उसे नदी के किनारे ले गए। वहाँ दो नावें खड़ी थीं। पहली नाव बिना पतवार की थी। दूसरी नाव में एक कुशल नाविक बैठा था। संत ने पहली नाव को नदी में धकेल दिया। तेज़ धारा उसे कभी इधर तो कभी उधर बहा ले जा रही थी। नाव पूरी तरह नदी के भरोसे थी। फिर उन्होंने दूसरी नाव को नदी में उतारा। नाविक ने पतवार संभाली और तेज़ धाराओं के बीच भी नाव को सही दिशा में आगे बढ़ाता रहा।

संत ने पूछा— “अर्जुन, इन दोनों नावों में क्या अंतर है?” अर्जुन बोला— “पहली नाव का कोई नियंत्रण नहीं है। वह धारा के भरोसे है। दूसरी नाव का नियंत्रण नाविक के हाथ में है।”
संत मुस्कुराए। “यही तुम्हारे जीवन की समस्या है।” अर्जुन आश्चर्यचकित रह गया।
संत ने कहा— “जब तुम्हारी खुशी लोगों की प्रशंसा पर निर्भर होती है, तब तुम पहली नाव की तरह हो।जब तुम्हारा मन दूसरों की बातों से टूट जाता है, तब भी तुम पहली नाव की तरह हो।
जब तुम्हारी शांति परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है, तब भी तुम उसी नाव की तरह हो जिसे धारा जहाँ चाहे बहा ले जाए।”
अर्जुन चुप था।
संत आगे बोले—
“दुनिया की धारा कभी नहीं रुकेगी।
लोग कभी प्रशंसा करेंगे, कभी आलोचना करेंगे।
कभी लाभ होगा, कभी हानि होगी।
कभी सफलता मिलेगी, कभी असफलता।यदि तुमने अपनी खुशी इन सबके हाथ में दे दी, तो तुम जीवनभर दुःखी रहोगे।”

अचानक संत ने अर्जुन से पूछा—
“यदि मैं अभी तुम्हारी प्रशंसा करूँ, तो क्या तुम खुश हो जाओगे?”

अर्जुन ने कहा—
“हाँ गुरुदेव।”

संत बोले—
“और यदि मैं तुम्हारी आलोचना करूँ?”

अर्जुन ने सिर झुका लिया।
“तो मुझे दुःख होगा।”

संत ने गंभीर स्वर में कहा—
“तो फिर तुम्हारे सुख का मालिक कौन है?

तुम या मैं?”

यह सुनकर अर्जुन स्तब्ध रह गया।
पहली बार उसे समझ आया कि उसकी खुशी का नियंत्रण उसके हाथ में नहीं था।वह लोगों की राय का गुलाम बन चुका था। उसकी शांति बाजार के भाव तय करते थे। उसका आत्मविश्वास दूसरों की प्रशंसा तय करती थी। उसका दुःख दूसरों की आलोचना तय करती थी। उस क्षण उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसे जीवन का सबसे बड़ा सत्य समझ में आ गया।

तब संत ने कहा—
“सर्वं परवशं दुःखं”
जो दूसरों के नियंत्रण में है, वह दुःख का कारण है।दूसरों का व्यवहार, मौसम, परिस्थितियाँ, धन, पद, सम्मान — ये सब हमारे नियंत्रण में नहीं हैं। इसलिए इनके आधार पर सुख खोजने वाला व्यक्ति कभी स्थायी सुख नहीं पा सकता।

फिर संत ने कहा—
“सर्वमात्मवशं सुखम्”
जो अपने नियंत्रण में है वही सुख है।हमारे विचार। हमारा दृष्टिकोण। हमारी प्रतिक्रिया। हमारे कर्म। यदि हम इन्हें नियंत्रित करना सीख जाएँ, तो परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, हम भीतर से शांत रह सकते हैं।

उस दिन के बाद अर्जुन ने अपना जीवन बदल दिया। अब वह प्रशंसा मिलने पर अहंकारी नहीं होता था। आलोचना मिलने पर टूटता नहीं था। लाभ मिलने पर कृतज्ञ रहता था। हानि होने पर उससे सीखता था। धीरे-धीरे उसके भीतर ऐसी शांति उत्पन्न हुई जो किसी बाहरी वस्तु पर निर्भर नहीं थी। कुछ वर्षों बाद लोग उसे नगर का सबसे प्रसन्न व्यक्ति कहने लगे। जब कोई उससे उसकी खुशी का रहस्य पूछता तो वह मुस्कुराकर केवल इतना कहता—”मैंने अपनी खुशी की चाबी दूसरों को देना बंद कर दिया है।” जीवन का सच्चा सुख बाहर नहीं, भीतर है। जब तक हमारी खुशी दूसरों की राय, प्रशंसा, धन, पद या परिस्थितियों पर निर्भर रहेगी, तब तक दुःख हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा। लेकिन जिस दिन हम अपने मन, विचारों और कर्मों को नियंत्रित करना सीख लेंगे, उसी दिन सच्चे सुख का द्वार खुल जाएगा। इसीलिए ऋषियों ने कहा है—

“सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥”

अर्थात् —

“जो दूसरों के अधीन है वह दुःख है, और जो अपने नियंत्रण में है वही सुख है।”

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